Friday, May 8, 2009

मौज नहीं लबनी पंजाब वरगी!

पिंडा दी जिंदगी दा अपना ही नज़ारा हुंदा ऐ। मेरे नानके अते दाद्केआ का सम्बन्ध निरोल रूप विच पिंडा नाल है। हाला के मेरा दाद्का परिवार बाद विच 'शेहरी' बन गया अते मेरी पूरी परवरिश वी शहर च ही होई पर नानके हाले वी पिंड वासी ही हन। पेंडू सबेआचार, कदरा-कीमता अते रवएता दी मैं दिलो कदर करदा हां। खास तौर ते पिंडा प्रति आदर-सत्कार हुन पहला नालो ज्यादा वध गया ऐ जदों 'मेट्रोज ' दी जिन्दगी नु ख़ुद जी के देखेअया।

किसे समय खन्ना शहर ऐवे छोटा जेहा लगना। वडे शेहरा दी जिंदगी नु 'मौज वाली' गिनना। पर जदों वडे शहरा दा माहोल देखेया ता एह ओपरा जेहा लगा। जदों डेढ़ साल दिल्ही अते नोइडा दी जिंदगी देखी ता सारे पंजाब नाल ही मोह जेहा पै गया। मेरा अपने 'पिंड' प्रति प्यार होर वी वध गया। दिल्ही अग्गे ता खन्ना शहर किसे 'पिंड' तो ज्यादा नही है।

हमेशा सोचना के तरक्की , पैसा अते मौके वढे शेहरा च वधेरे हन। एह सच वी है। पर नाल एह वी सुनेया सी के वड़ा शहर वडिया मुश्किला। सबब बनेया अते नोइडा सतिथ जी पंजाबी तो इंटरव्यू कॉल आ गई। बाद विच दफ्तर दिल्ही वी रिहा । कॉलेज दा लंगोटिया यार शोरी (मनोज ) नोइडा ही किसे कंप्यूटर कंपनी च नौकरी करदा सी। ओस्दे आसरे मैं वी ज्वाइन कर लिया ।

नोइडा मेरा रहन -सहन मेरे दफ्तर दे सारे साथेया तो वदिया सी। वधा , खुला-धुला अते हवा दार फ्लैट । पर किराया वी मोटा सी जो तनखा दा इक वडा हिस्सा हरेक महीने खीच लैंदा सी। सब तो मुश्किल भरा कम सी घर तो दफ्तर अते दफ्तर तो घर तक दा सफर। लोकल बसा (ब्लू लाइन) सवारिया नाल तुनिया पएअया हुनदिया सी। नोइडा घर तो नेहरु प्लेस स्तिथ ओखला चैनल दे दफ्तर तक डेढ़ घंटा लगदा सी। कई बार ता सारा सफर खड़े-खड़े ही करना पैंदा। उपरो ब्लू लाइन ड्राईवर दी खतरनाक ड्राइविंग। कंडक्टर दी भद्दी अते आदर रहित बोलबानी, सवारिया दा इक-इक रुपये पीछे लड़ना अते धका-मुकी हुँदै लोका नु देख के मन काहला पैना।

ओहनी दिनी मेरी नाईट शिफ्ट चल रही सी. सारी रात कम्म कर के सवेरे 8 कु वजे मैं दफ्तरों तुर पया. दफ्तर तो बस स्टैंड तक दा 15 मिनट दा पैदल रास्ता सी. स्टैंड ते जा के पता चलेया के अज ब्लू लाइन वालेया दी हड़ताल है. 12 बजे तक कोई बस ना आई. नींद दा टूटा मेरा शरीर हिचकोले खा रिहा सी. ऑटो रिक्शा वाले नु पुछेया. जमना पार (भाव नॉएडा दा इलाका) जान लई पहला ता कोई मन्ने ही ना. जेहरा मन्दा सी ओह पैसे एने कु मंग रिहा सी जिन्हा नाल पंजाब आ के मुडेया जा सकदा सी. खैर, दुपेहर 1 बजे सवारिया नाल नको-नक भरी इक 'व्हाइट लाइन' बस आई अते मेरे याद नहीं के मैं उस च किवे चडेया ते किवे घर पुजा.

बगैर कुझ खाए-पीये मैं 3 कु बजे सौ ता गया पर शाम नु 7 कु बजे दफ्तरों फिर फ़ोन आ गया के तयार हो जा कैब (दफ्तर दी कार) 9 कु बजे लैन आऊ. एहो जहे वाकेआ थोड़े-थोड़े समय बाद अक्सर वापर जायेअया करदे सन. ' घरो जाना कम उत्ते अते कम तो वापस घर परत आउणा '. दिन मुक जाना पर बस्सा दा सफ़र ही ना मुकना! दिन बाद च चड़ना हनेरा पहला पै जाना. दिना दी गिनती दा शहर दी रफ़्तार अगे कोई हिसाब ही ना रहना. घंटा-घंटा बस/कैब जाम च ही खड़ी रहनी. किते जान दा प्रोग्राम बनौना ता दो घंटे दा वकफा रख के चलना.

नॉएडा जिथे रेहन्दे सी, उस इलाके च तक़रीबन हरेक हफ्ते लुट-खो अते कूट-मार दी घटना वापर जांदी सी. वेले-कुवेले घरो निकल्देया हर व्यक्ति ही शाकी जेहा लगना. दुःख वेले वी ओही चार कु साथी अते ख़ुशी वी ओहना नाल ही मनौनी. रब-रब करदे पंजाब परते.

जे किते पिंड ना होण, शहर खास तौर ते मेट्रो शहर ता मानसिक बीमारिया दा घर ही बन जान. कई रिश्तिया दी होंद ही मुक जावे. कदरा-किमता, अप्नत अते मोह दा वजूद ही ना रहे. पैसा ता क्मायेआ जाऊ पर खरचन लई समा नहीं होना. भला अजेहे शेहरा च रह के की करना ! इस नालो ता पिंड ही चंगा ! एवे ता नी कहंदे के ' जो सुख छ्जू दे चुबारे, ओह ना बलख ना भुखारे.'

3 comments:

tejinder sharma said...

Its an amazing article..I could actually see myself as the protagonist of this story.. I have gone through the same situation.. The show must go on......

Yadwinder S. Kalsi said...

22 g aiven ta ni assi tuhanu kehnde k BONDLI gera maaro.....

Bhupinder Kohli Chadha said...

I can well-relate to this write-up as I had faced similar situation couple of times, may be its part of so-called plush metro-lifestyle. Even if the bus is jam-packed - "til rakhan dii thaan nahi hundi" - still the bus conducter makes more people hop-on and actually has the ability to create space.

I have lived in Punjab, Delhi, Noida and now US.. nothing is as beautiful, warm & welcoming as Punjab. I sincerely wish, we may have enough oppurtunities in Punjab so that none of us has to leave the homeland for professional growth.

Some of my journalist friends are happy and contend with even peanuts salaries they get in regional editions & publications. Nothing alllures them more than the love and comfort that Punjab offers.